Best Web Blogs    English News

facebook connectrss-feed

My Thoughts....मेरे विचार

Just another weblog

16 Posts

37 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.

भारतीय समाज और वर्ण व्यवस्था (Indian Society and Varna Vyavastha)

पोस्टेड ओन: 18 Aug, 2012 जनरल डब्बा,पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

वैसे तो मै जाती धर्म पर आज की परिस्तिथियो में अपना मत नहीं रखना चाहता, क्योकि आज ये हमारे समाज को जोडती नहीं तोड़ रही है. परन्तु यह भी सच है अगर समाज किसी बात लेकर गलत अवधारणा रखता हो, तो हमे उस पर अपने विचार जरूर प्रस्तुत करने चाहिये. मै आज हिन्दू समाज और वर्ण वयवस्था पर बात करना चाहुगा. क्योकि वर्ण वयवस्था को लेकर आज हमारे बीच काफी भ्रान्तिया है, चाहे वो हिन्दू हो या किसी और धर्म का वह आज हमारे समाज में दिख रही जातीय संरचना को देखकर इस वयस्था का विवेचना करता है. परन्तु आज मै आप सभी भाइयो को बताना चाह रहा हु, की आज आप जो देख रहे हो, वो इस वयवस्था को बिगड़ा हुआ स्वरुप है. मै आज इस लेख के माध्यम से हिन्दू धर्म और वर्ण वयवस्था पर आधारित कुछ तथ्य प्रस्तुत करना चाहुगा. हिन्दू धर्म के चार वेदों में सबसे पुराने वेद ऋग्वेद में जन्म के आधार पर किसी भी प्रकार की वर्ण वाव्स्था का उल्लेख नहीं है. और महाभारत के शांति पर्व में के पेज नंबर १० में १८८ नंबर श्लोक में लिखा है

ना विशेषो अस्ति वर्णाना सर्वम ब्राम्हमिद जगत।
ब्रहांण पूर्व सष्ट हि कर्मभि वर्णतान्गतम ॥
॥१८८ -१० ॥

अर्तार्थ जन्म से तो हम सभी ब्राह्मण होते है तत्पश्चात हमारे कर्म के हिसाब से हमारा विभाजन होता है. और जो व्यक्ति सिर्फ अपने किसी जाती विशेष में पैदा होने के कारन गर्वित महशूस करता है या हिन् भावना से ग्रसित होता है, वह इश्वर का अपमान करता है. क्योकि इश्वर ने तो हमे एक सा बनया है और हम अगर इश्वर की बनाई चीज का अपमान करते है तो हम उनका अपमान करते है. मैंने अक्सर देखा है की लोग हमसे हमारी जाती पूछते है, जो की सर्वथा गलत है, और हम, जिसमे मै अपने आप को भी शामिल करना चाहुगा, अभी इस मानसिकता से नहीं निकले है. अब दूसरा पहलु, हममे से कुछ लोग अपनी जाती बताने से शरमाते है, तो मै उनसे कहना चाहुगा की अगर आप इस तरह की भावना रखते है तो यहाँ ये सर्वथा गलत है. आप को किसी भी तरह से हिन् भावना महसूस करने की जरूरत नहीं है, क्योकि आपने दुनिया के किसी कोने में, किसी जाती या किसी धर्म में जन्म लिया, ये सब इश्वर की मर्जी है, आपकी नहीं. और जो व्यक्ति इस आधार पर आपसे भेदभाव रखता है वह न सिर्फ इश्वर का मजाक उडाता है बल्कि साथ ही साथ अपनी शंकिर्ण मानसिकता का परिचय भी देता है. ब्राम्हण के बारे में महाभारत के शांति पर्व में लिखा है, की जो ज्ञानी है, और जो इश्वर की हर कृति का सम्मान करता है, उन्हें जानता है वह ब्राम्हण है. और जो व्यक्ति वर्ण वयवस्था को जाती के आधार पर बाटते है वो वास्तविक रूप में हमारे इस वयवस्था के शत्रु है. आपको यह बताना चाहुगा की सम्पूर्ण विश्व के हर देश में वर्ण वयवस्था कायम है. और जाती व्यवस्था तो भारतीय समाज में आई एक घ्रणित विक्रती है. और कुछ सवार्थी लोगो ने इस वयवस्था को कलंकित किया है. और यह सिर्फ कुछ सौ वर्षो के अन्तराल में हुआ है. अगर कोई भी व्यक्ति हिन्दू धर्म की विवेचना इन कुछ वर्षो और वर्तमान जातीय वयवस्था के आधार पर करते है तो मेरा उनसे निवेदन है की वो हामरे वेदों का जाकर पड़े. जिनसे आज भी सारा विश्व सिख रहा है. भारतीय दर्शन के लोकप्रिय और व्यवहारिक ग्रन्थ गीता में लिखा है

ब्राम्हण क्षत्रिय विन्षा शुद्राणच परतपः।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभाव प्रभवे गुणिः ॥
गीता॥१८-१४१॥

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥
गीता॥४-१३॥

अर्तार्थ ब्राह्मण, क्षत्रिया , शुद्र वैश्य का विभाजन व्यक्ति के कर्म और गुणों के हिसाब से होता है, न की जन्म के. गीता में भगवन श्री कृष्ण ने और अधिक स्पस्ट करते हुए लिखा है की की वर्णों की व्यवस्था जन्म के आधार पर नहीं कर्म के आधार पर होती है. भारतीय आध्यात्म में भागवान को भी वर्ण के हिसाब से बाटा गया है. ब्रम्हा, जिन्होंने हमे इस संसार में लाया, दुसरे विष्णु जिन्होंने हमारा पालन किया और भगवन शिव जिन्हें आज पुरे भारत में सबसे ज्यादा पूजा जाता है, और जिन्हें कल्याण करने वाला या सेवा करने वाला कहा जाता है. और जो शिव लोगो की सेवा करते है या कल्याण करते है , उन्हें सबसे ज्यादा पूजा जाता है. यह बात अनुकरणीय है की वेदव्यास जिन्होंने महाभारत और बहोत सारे ग्रंथो की रचना की उनकी माँ शुद्र वर्ण में थी न की ब्राह्मण. और पुरातन या वैदिक भारतीय समाज में विवाह जाती देख कर कभी नहीं होते थे, ये जो आज आप आज देख रहे है ये हमारे समाज की विक्रति है न की जो हमारे वास्तविकता. मह्रिषी वाल्मीकि जिन्होंने रामायण जैसे महाकव्य की रचना की उनका जन्म सूद्र वर्ण वाले पिता के यहाँ हुआ था, परन्तु वो तो ब्राह्मण कहलाते है. भारतीय समाज में वर्णों के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव कभी नहीं था, जो आज आपको दिख रहा है. आपकी जानकरी के कहुगा की भगवन श्रीराम की माता सुमित्रा के पिता ब्रह्मण वर्ण के और माता सूद्र वर्ण की थी. जिस भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत है उनके पिता दुष्यंत क्षत्रिया थे और माता मेनका रूपी अप्सरा की पुत्री शकुन्तला थी. भगवन श्री क्रष्ण की माता असुर वंस की थी जबकि पिता वासुदेव क्षत्रिया थे.ये सब बाते यह चरितार्थ करती है की भारतीय समाज या हिन्दू दर्शन में किसी जातीगत भेद का उल्लेख कभी नहीं रहा, और वर्ण व्यवस्था आज हर जगह है , सिर्फ नाम बदल गय है. और जो व्यक्ति विकृत ग्रंथो के आधार पर हिन्दू दर्शन को परिभाषित करते है उनसे मेरा निवेदन है की. भारतीय समाज के आधार स्तम्भ चार वेदों जिनका अनुसुरण विश्व के सारे देश कर रहे है और श्रीमद भगवत गीता का ध्यान पूर्वक अध्यन करे.

धन्यवाद्
अजय सिंह नागपुरे



Tags: Dirty jokes  Adult Jokes  NonVeg Jokes & Dirty Adult Jokes in English  Hindi & Punjabi Like Adult Jokes  Sex Jokes  Santa Banta Jokes  Non Veg Jokes  Hindi Non Veg Jokes  Punjabi Jokes  Adult Hindi Humor  Dirty SMS in Hindi  Dirty Adult Hindi Adult Jokes  Dirty SMS  Funny Dirty Jokes  Dirty Humour  Santa Banta Dirty  Jija Sali Non-Veg SMS Joke  

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (4 votes, average: 4.50 out of 5)
Loading ... Loading ...

7 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Similar articles :
पूर्वजों की खुशी के लिए ये क्या कीमत चुकाई इस 9 साल के बच्चे ने…पढ़िए एक शादी की हैरतंगेज हकीकत

‘सात’ के रहस्यमयी कवच में छिपी है दुनिया, जानिए इससे कैसे जुड़ी है आपकी जिंदगी

सांई बाबा हिन्दू थे या मुसलमान? जानिए शिर्डी के बाबा के जीवन से जुड़ा एक रहस्य

मां और पत्नी की वजह से घर अखाड़ा बन गया है !!

क्या हम हिन्दु हैं

सहनशीलता और कट्टरता

पति 112 साल का और पत्नी 17 साल की….पढ़िए ऐसे ही कुछ अजीबोगरीब प्रेमी जोड़ों की कहानी

क्यों मिला था भगवान विष्णु को श्राप, नेपाल के इस प्राचीन मंदिर में छिपा है उन्हें मुक्त करने का रहस्य

मानवता को खंड-खंड करता धर्मों का पाखंड

एक अप्सरा के पुत्र थे हनुमान पर फिर भी लोग उन्हें वानरी की संतान कहते हैं….जानिए पुराणों में छिपे इस अद्भुत रहस्य को

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

August 21, 2012

श्री नागपुरे वेद पुराण एवं श्रुति-उपनिषद् आदि किसी स्थान, धर्म या जाति विशेष के लिए नहीं संकलित या निर्मित हुए है. बल्कि देश-काल एवं परिस्थिति को ध्यान में रख कर उन्हें अस्तित्व प्रदान किया गया है. आप ने जिन उद्धरणों का उल्लेख किया है उसके अलावा देखिये- “जन्मना जायते शूद्रो संस्कारेण द्विजोत्तम वेद पाठी ब्रह्मचारी ब्रह्म जानातीति ब्रह्मणः. अर्थात जन्म से सब शूद्र होते है. जब उनका संस्कार होता है तो उसका दूसरा जन्म होता है. और वह द्विज हो जाता है. वेद पाठ करना शुरू करने पर वह ब्रह्मचारी हो जाता है. और जब ब्रह्म (सत्य) को जान जाता है तो वह ब्राह्मण हो जाता है. अब ज़रा इसे देखें- ब्राह्मणों अस्य मुखमासीद बाहू राजन्यः कृतः. उरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत. अर्थात ब्राह्मणों का उद्भव इस (सत्य-ईश्वर) के मुख से हुआ है. इसके बाहों से राजाओं (क्षत्रियो) का जन्म हुआ है. उदर से विषयों का जन्म हुआ है. तथा पैरो से शूद्रो का जन्म हुआ है. ये दोनों ही उदाहरण धर्म ग्रंथो के ही है. किन्तु जिनका अर्थ हम लगा लेते है. वह तो आदर्श कताहन है. तथा जिनका अर्थ हम नहीं समझ पाते है. वह कथन आलोचना का शिकार हो जाता है. इसमें क्या असत्य है क़ि मुख से ब्राह्मण का जन्म होता है? दसनेन नियंत्रितो जिह्वा वाचा या सर सरस्वती. दसनेन अर्थान दसनो या दांतों के द्वारा हर तरह से नियंत्रित, संयमित एवं अनुशासित जिह्वा के द्वारा निर्झरसर के रूप में सरस्वती उद्गमित होती है अब जो निरंतर ऐसी सरस्वती की उपासना करे उसे ब्राह्मण नहीं तो और क्या कहेगें? अब रही जन्म से या कर्म से की बात. अभी मैंने आप के पिछले लेखन पर कुछ अपना मंतव्य दिया था. तो आप ने अपनी इस रचना को भी पढ़ने का आमंत्रण दिया. उस में मैंने जाति व्यवस्था पर अपना मंतव्य दिया था. अभी यह बताएं क़ि यदि आप के बेटे को बुलाना हो और यह कहा जाय क़ि ऐ डाक्टर के लडके ! इधर आओ. तो अब आप क्या कहेगें? फिर आगे चल कर उनकी संतानों को कोई कहे क़ि यह तो डाक्टर जाति वाले है. तो आप क्या कहेगें क़ि ये डाक्टर जाति वाले नहीं है? अब आप की संतान तो जन्म से ही डाक्टर जाति से सम्बंधित है. जन्म और कर्म से जाति की व्यवस्था एवं उनके वर्गीकरण पर माथा खपाकर वास्तविक मंतव्य से भटकना किसी प्रकार लाभ दायक नहीं हो सकता है. क्या आप नहीं देखते है क़ि किसी सरकारी विभाग में सफाई कर्मी की नौकरी पाने वालो में ब्राह्मण परिवार के कितने सदस्य आवेदन दे रहे है? और जाति व्यवस्था को तो हमारा संविधान ही मान्यता दे रहा है. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति, पिछड़ी जाति, क्रीमी लेयर, आदिवासी, सवर्ण आदि. फिर इसको किस विधान पर समाप्त करने की कवायद? “शू हाउस” चलाने वाले क्या सब चमार जाति के ही है? “टेलरिंग शाप” चलाने वाले क्या सब मुस्लिम सम्प्रदाय के ही है? यह सब एक तर्क-वितर्क एवं कुतर्क आदि के आधार पर वाद-विवाद करने का एक अच्छा साधन है. इसके अलावा और कुछ नहीं है. तर्क करना है, सोचना है या आवाज उठानी है तो उन संगठन रूपी जातियों पर उठायें जिनमे सब जातिया मिली हुई है और मिल कर अत्याचार कर रही है. समाज को बाँट रही है. देश को बाँट कर लूट रही है. जैसे एम् पी जाति, एम् एल ए जाति, सभासद जाति, अधिकारी जाति आदि. इन जातियों के विरुद्ध आज के परिप्रेक्ष्य में आवाज़ उठाना समीचीन होगा. ये जातियां ही हर अत्याचार एवं आतताई कृत्यों के लिए ज़िम्मेदार है.

Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
August 21, 2012

आदरणीय अजय जी, आपके लेख से पूरी तरह सहमत हूँ, समाज के ज़्यादातर लोग आज जाती व्यवस्था को गलत मानते हैं किन्तु कोई भी इसे दूर करने के लिए सार्थक कदम नहीं उठा रहा है आपने अत्यंत आवश्यक उद्धरणों द्वारा अपनी बात को रखा यह काबिले तारीफ़ है मेरे कुछ लेख जाती व्यवस्था के विरोध में लिखे गए हैं जिनमे मैंने जाती व्यवस्था का अंत करने के लिए सुझाव दिया है की जब तक लोग अपने नाम से जाती सूचक शब्द नहीं हटायेंगे तब तक जाती व्यवस्था समाप्त नहीं हो सकती…..आपके नाम में जाती सूचक शब्द नहीं है किन्तु क्षेत्र सूचक शब्द है जो की एक अलग तरह के सम्प्रदायवाद को जन्म दे सकता है…. किन्तु आपके लेख के लिए आपको बधाई, मेरे सांप्रदायिक दंगे पर लिखे इस लेख पर आपकी प्रतिक्रिया चाहूँगा http://panditsameerkhan.jagranjunction.com/2012/08/18/18/

Chandan rai के द्वारा
August 21, 2012

अजय जी , एक बेहतरीन लेख के लिए मेरा हार्दिक अभिनन्दन स्वीकार करें ! आपके विचारों से सहमती !

dineshaastik के द्वारा
August 19, 2012

अजय जी, बहुत सुन्दर आलेख। आपके विचारों से सहमत एवं समर्थन…..




  • ज्यादा चर्चित
  • ज्यादा पठित
  • अधि मूल्यित